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भारतीय सामरिक चिंतन की जड़ें: अर्थशास्त्र से रणनीतिक स्वायत्तता तक | India's Strategic Culture

भारतीय सामरिक चिंतन की जड़ें: अर्थशास्त्र से रणनीतिक स्वायत्तता तक | India's Strategic Culture8. Okt.1 Std. 15 Min.

भारत युद्ध, शांति और ताकत के बारे में जैसा सोचता है, वैसा क्यों सोचता है? हर देश के पास एक तरह की अनदेखी किताब होती है, जो उसके इतिहास, उसके ग्रंथों और उसके पुराने अनुभवों से बनती है। यही किताब तय करती है कि वह दोस्तों और दुश्मनों से कैसे पेश आएगा। इसे ही हम सामरिक संस्कृति कहते हैं, और आज इसे समझने के लिए हमारे साथ हैं MP-IDSA से डॉ. सौरभ मिश्रा। उनके साथ हम अर्थशास्त्र के पन्ने पलटेंगे, और चाणक्य से जुड़ी आम मिथ्या और ग्रंथों में से उभरते चित्र के बीच अंतर समझेंगे। साथ ही कुछ दिलचस्प सवाल भी उठाएँगे: क्या पड़ोसी हमेशा दुश्मन ही होता है? पुराने ज़माने में “राष्ट्र” शब्द का मतलब क्या था? और सबसे बड़ा सवाल: क्या अब भारत को अपनी रणनीति पर फिर से सोचना चाहिए? तो चलिए, डॉ. मिश्रा के साथ यह बातचीत शुरू करते हैं।

We discuss:

* What is Strategic Culture?

* Indian texts which are a part of India’s Strategic Culture

* How Strategic Culture shapes decision making

* Tanhem’s view and criticism

* China’s Strategic Culture

* Impact of Colonisation

* Arthashastra and Chanakya

* Is your neighbouring state always your enemy?

* Rashtra: ancient meaning vs modern usage

* Why is Pakistan’s Strategic Culture different from India’s?