Pratidin Ek Kavita

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Parcham | Kumar Ambuj

Parcham | Kumar Ambuj9 oct.3 min

परचम।  कुमार अम्बुज

वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला

कोई उसे छू भी नहीं रहा है

किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा

लेकिन देखो, वह खिला हुआ है

बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए

एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में

आसपास की हर चीज़ इशारा करती है

तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू

दुर्दिनों के किनारे शब्द

मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है

जैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं